शिशु को घुटनों के बल चलने दें, शिशु घुटने के बल चलना सीखे

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baby starts walking on his knees

बच्चों का घुटनों के बल चलना, प्राकृतिक नियम है इससे शिशु के शारीर को अनेक प्रकार के स्वस्थ लाभ मिलते हैं जो उसके शारीरिक, मानसिक और संवेगात्मक विकास के लिए बहुत जरूरी है। इससे पहले की बच्चे पैरों के बल चलना सीखे, वे घुटनों के बल चलना सीखते हैं।कई बार हो सकता है आपके मन में यह सवाल आया होगा कि क्या शिशु का घुटने के बल चलने का कोई फायदा है?
सच बात तो यह है कि जब बच्चे घुटनों के बल चलते हैं तो एक प्रकार से उनके शरीर का व्यायाम होता है। उनके पैरों में ताकत आती है और खड़े होकर चलने की क्षमता विकसित होती है।
पैरों पर चलने से पहले बच्चों का घुटनों के बल चलना, प्राकृतिक नियम है। प्रकृति ने यह नियम हम मनुष्यों के लिए इसी उद्देश्य से बनाया है।


पैरों के बल चलने से पहले, घुटनों के बल चलने से शिशु को अनेक प्रकार के स्वास्थ्य लाभ मिलते हैं। शिशु का घुटनों के बल चलना उसके शारीरिक, मानसिक और संवेगात्मक विकास के लिए बहुत जरूरी है।
शिशु के शारीरिक विकास के लिए
जब बच्चे घुटनों के बल चलते हैं तो पैरों के साथ-साथ उनके हाथों का भी इस्तेमाल होता है। इस तरह शिशु के हाथ और पैर दोनों की हड्डियों और मांसपेशियों को मजबूती मिलती है साथ ही उनका शरीर लचीला बनता है।
जब बच्चे अपने घुटनों के बल चलते हैं तो उनका पैर शरीर को मोड़ना, घुमाना साथ ही चलने और दौड़ने जैसी जरूरी प्रक्रिया को समझता है और सीखता है।
शिशु जब घुटनों के बल चलना शुरू करता है तो उसके शरीर को प्रोटीन और कैल्शियम युक्त आहार की आवश्यकता पड़ती है।
अगर इस समय आप शिशु के आहार में ऐसे भोजन को सम्मिलित करें जिसे प्रचुर मात्रा में चींटियों को प्रोटीन और कैल्शियम मिले तो उसकी हड्डियां मजबूत बनेगी और उसकी मांसपेशियों का विकास बहुत तेजी से होगा।


घुटने के बल चलना प्रकृति का नियम
शिशु के अच्छे मानसिक विकास के लिए यह जरूरी है कि वह खुद चीजों को करके सीखें। इसी के अंतर्गत प्राकृतिक ने शिशु के लिए घुटनों के बल चलने का नियम निर्धारित किया है।
जब शिशु पैरों के बल चलता है तो उसमें गति और स्थिति के नियमों को समझने की क्षमता बढ़ती है। इसके समाज से शिशु अपना संतुलन बनाना सीखना है।
शिशु किस प्रक्रिया से अपनी आंखों और हाथों की गति में सामंजस्य स्थापित करना भी सीखता है। घुटनों के बल चलने के दौरान क्योंकि अपने आसपास की चीजों से संबंधित समझ बढ़ती है।
दृष्टि और सामंजस्य की क्षमता का विकास
घुटनों के बल चलते वक्त जब शिशु एक स्थान से दूसरे स्थान जाता है तो उसमें आंखों और दृष्टि के नियमों की समझ बढ़ती है। इसके साथ ही उसकी दृष्टि की क्षमता का विकास होता है।
इससे पहले नवजात अवस्था में जब शिशु केवल गोद में रहता था तो वह केवल अपने आसपास की वस्तुओं को दूर से देख सकता था लेकिन घुटनों के बल चलने के दौरान उसमें पास और दूरी की समझ का विकास पड़ता है। या यूं कहें कि उसमें दूरी से संबंधित समझ का विकास होता है।
इस समझ के आधार पर वह यह निर्णय करना सीखता है कि उसे किस गति से कहां पर पहुंचना है कि शरीर को नुकसान ना पहुंचे तथा दूरी के आधार पर एक स्थान से दूसरे स्थान पहुंचने पर कितना समय लगेगा।


मस्तिष्क का विकास
बच्चों पर हुए अनेक शोध में यह बात सामने आई है कि बच्चों का दुनियावी चीजों से संबंधित विकास सबसे ज्यादा बच्चों का घुटने के बल चलने के दौरान हुआ।
यह शिशु की जिंदगी का वह महत्वपूर्ण पड़ाव है जब शिशु का दाया और बाया मस्तिष्क आपस में सामंजस्य स्थापित करना सीखता है।
ऐसा इसलिए क्योंकि इस समय शिशु एक साथ कई काम कर रहा होता है जिससे उसके दिमाग के अलग-अलग हिस्सों का इस्तेमाल हो रहा होता है।


उदाहरण के लिए जब शिशु घुटनों के बल चलता है तो वह अपने हाथ और पैर दोनों का इस्तेमाल करता है तथा तापमान, दूरी, गहराई जैसे ना जाने अनेक चीजों को भी अपने तजुर्बे से इस्तेमाल करना सीखता है। इस समय शिशु के दिमाग का विकास अपने चरम पर होता है।
यह शिशु के आत्मविश्वास को बढ़ाता है
घुटनों के बल चलने से शिशु के आत्मविश्वास में बढ़ोतरी होती है क्योंकि वह अपनी जिंदगी के बहुत से दैनिक फैसले खुद लेना शुरू करता है।


यह शिशु के आत्मविश्वास को बढ़ाता है
उदाहरण के लिए दूरी या गहराई के आधार पर वह यह निर्णय लेना शुरू करता है कि उसे किस दिशा में घुटनों के बल आगे बढ़ना है या उसे कब रुकना है।
इस तरह से उसे हर शारीरिक गतिविधि के लिए कुछ ना कुछ निर्णय लेना पड़ता है। इस तरह समय से निर्णय लेने से उसमें आत्मविश्वास के साथ साथ सोचने और विचार करने की क्षमता का भी विकास होता है।


घुटनों के बल चलने के दौरान कई बार बच्चों को चोट भी लगती हो जो उनमें जोखिम लेने का साहस पैदा करते हैं और साथ ही असफल होने की स्थिति में उसके अंदर पुनः प्रयास करने की समझ और साहस विकसित करते हैं। इस प्रकार का समय और आत्मविश्वास दोनों आगे चलकर पैरों के बल चलने में मदद करते हैं।

बच्चों के अनुक्रम में दांत कैसे चढ़ते हैं। मालिश की मदद से। कठिन अवधि कब तक है

प्रत्येक माता-पिता अपने बच्चे के बारे में चिंता करते हैं जब उसके दांत चढ़ते हैं। लेकिन यह याद रखने योग्य है कि ऐसी दर्दनाक अवधि लंबे समय तक नहीं रहेगी। इस समय, माता-पिता को अपने बच्चे पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है, साथ ही साथ दांतों की प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने का प्रयास करना चाहिए।

बच्चे के दाँत कैसे चढ़ते हैं और उसके लिए विकास के ऐसे कठिन दौर में एक छोटे आदमी की मदद कैसे की जाती है, इसके बारे में नीचे वर्णित किया जाएगा।

शिशु की शुरुआती अवस्था कब होनी चाहिए?

लेकिन यह भी होता है कि दांत अपने समय पर और गलत क्रम में दिखाई देते हैं, जैसा कि आमतौर पर सभी चिकित्सा निर्देशिकाओं में दर्शाया गया है। और चिंता की कोई बात नहीं है, क्योंकि दाँत मसूड़ों से उस क्रम में बढ़ने लगते हैं जो तब स्थापित किया गया था जब एक छोटा बच्चा अपनी माँ के पेट में था।

विशेष साहित्य में लिखी योजना के अनुसार कुछ नहीं हो रहा है तो बहुत चिंता न करें। क्योंकि किसी भी मामले में, बच्चा अपने पहले दांतों के पूर्ण सेट के साथ होगा।

लक्षण

कई प्रकार के लक्षण हैं जो इस तथ्य को दूर कर देंगे कि पहला नागरिक अपने पहले दांतों की शुरुआती उपस्थिति की उम्मीद करता है।

Anjali

मेरा नाम अंजली पाल है, मैंने डीयू (दिल्ली विश्वविद्यालय) से स्नातक किया है, मैं दिल्ली से हूं। मेरा मनना है – “जानकारी जितनी हो भी कम हो, कम ही रहती है”

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